لما هو مختلف
في غيابك..
المطــر…. ؟
وكأنه… ينذر….
بعواصف رحيل….
تبعثر ليال.. الســهر
مبتلة أوراقي….
في العراء...
يالخوفي…. أن
تمحى قصائد….
كتبتها….
حينما كنت صديقا..
للمــطر….
أتذكرين…. ؟
كنا نلملم…. حتى
الأثــــر…..
كانت الريح..
تغازلك….
فتثور غيرتي…. وأخبئك..
تحت معطفي…..
أكذب عليك…..
وتصدقيني….
خارج أحظاني…
بقاءك..
وسط الأعاصير….
ضياع وخطــر…!
مختلف..
هذا الشتاء...
هو المطــر.. ؟
لاعطر فيه….
في غيابك…..
يطرق نافذتي ...
الحان هطوله....
أغتراب…. في المساء
والايقاع.. ضجــــر…..
مفجوعة..قصائدي
مثلي…
كلانا…. نواسي..
فجيعة. الوتــــر…
طويــــــــلة….
كمديات.. حزني
لحظات..إغترابي
جليس ذكريات
تحلم بصدفة
اللقاء....
لست أدري… ….
إينا في غربتهِ
شوقاً..... أحتظر…!
لما صدقت.. أوهامي
وانتِ…..
كسحب.. أمنياتي..
راحلة عني….
تعشقي مواسمي….
وتغادريها….
حسرة تنتاب
حقولي
كلما أطلت..
اليها...... النظر
ها.. أنا..
ولست أنا…. !
أرسم ملامح.....لقاء
في الطرقات...
يمحوه
في غيابك...المطر....!!

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